बग्वाली मेले के बहाने अपने गांव को याद कर रहे हैं चारु दा

 Charu Tiwari

 

चारु तिवारी जनसंघर्षों के लिए समर्पित पत्रकार और लेखक, राज्य आंदोलनकारी और सोशल एक्टिविस्ट हैं।
इतने करीब हैं फिर भी दूर समझ लिया!
खामोश थे हम तो मगरूर समझ लिया,
चुप हैं हम तो मजबूर समझ लिया।
यही आप की खुशनसीबी है कि
हम इतने करीब हैं फिर भी दूर समझ लिया।
बग्वालीपोखर। एक ऐसी जगह जिसका जिक्र आते ही मेरे सामने अतीत के कई पन्ने एक साथ खुल जाते हैं। अपने-आप। कोई किताब या संदर्भ नहीं चाहिये। बस कोई बहाना चाहिये, मौका चाहिये। जब दीपावली आती है तो बग्वालीपोखर जीवंत होकर, उन्मुक्त होकर सामने खड़ा हो जाता है। बुलाता है अपनी ओर। खींचता है, जोर से। कभी पुचकारता है, तो कभी डांटता है। शिकायत करता है। न आने का कारण तो नहीं पूछा, लेकिन उसे हमेशा आने की आस रहती है। इसीलिये तो अभी भी खड़ा है उसी जगह, अपनी थाती को लिये हुये। उसी तरह जैसे हमारे गांवों को हमारा इंतजार रहता है। कभी तो आयेंगे अपने लौटकर। हमारे खेतों को, जंगलों को, गीत-संगीत को, हमारे परिवेश को उम्मीद रहती है कि शायद कुछ पिछला लौटकर आ जाये, नये के साथ। नई समझ के साथ।
फिलहाल इस बार भी ‘बग्वाली मेला’ छूट गया। बग्वाली मेले में न जाने का मतलब है एक साल तक फिर अपनों से बिछड़ जाना। अतीत को याद करने, उसमें खो जाने के मौके का चूकना। एक तरह से बग्वालीपोखर मेरे लिये सोच-समझ का रास्ता है, आगे बढ़ने की चेतना है। यहीं से एक खिड़की खुली रोशनी की। इस खिड़की ने चेतना का एक बड़ा दरवाजा खोल दिया। समाज को देखने का नजरिया दिया। दुनिया के सामने खड़े होने का साहस दिया। सच और मजबूती के साथ। प्रतिबद्धता के साथ आगे बढ़ने की प्रेरणा भी दी। आपको वह जमीन बहुत कुछ देती है, जिसमें आप घुटनों के बल चलना सीखते हैं। अपने पैरों पर खड़े होते हैं। सरपट दौड़ने लगते हैं। बहुत दूर निकल जाते हैं। वहां से फिर वापस आना चाहते हैं। वहीं लौटना चाहते हैं। शायद वही यह जगह है, जो हमें सही मुकाम दे सकती है। बग्वालीपोखर को नमन।
बग्वालीपोखर से मेरा नाता बहुत पुराना है। लगभग उतना ही जितनी मेरी उम्र है। लगभग 55 साल की। मेरा घर अल्मोड़ा जनपद के द्वाराहाट विकासखंड के ग्राम मनेला में है। बग्वालीपोखर से सात किलोमीटर दूर। गगास नदी के तट पर। मैंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा बग्वालीपोखर के प्राइमरी स्कूल से की थी। यह 1972-73 की बात है। केशर सिंह मास्साब हमारे हेड मास्टर थे। बहुत कड़क मिजाज। आकाश छूते बरगद के पेड़ से निकली जमीन तक फैली लताओं के बीच बड़ी छांव में प्रकृति को आत्मसात करती हमारी कक्षायें लगती थी। हमारे चारों तरफ हरी-भरी क्यारियां। एक सुन्दर और रचनात्मकता से भरा स्कूल परिसर। रवाड़ी के मोहन चन्द्र तिवारी मास्साब की बनाई पेंटिंग से सजी दीवारें।
बग्वालीपोखर में स्कूल की स्थापना 1871 में हो गई थी। उस समय सोमेश्वर, द्वाराहाट, बेरीनाग, दारमा, देवलथल, चौखुटिया में तहसीली स्कूल थे। इनमें से बेरीनाग, दारमा, द्वाराहाट के स्कूल स्याल्दे, खेतीखान और बग्वालीपोखर को बदले गये थे। शायद उसी स्कूल के बिल्डिंग का खंडहर था जिसमें हम चोर-सिपाही का खेल खेलते थे। यहां से निकले तो इंटर कॉलेज में चले गये। इसी स्कूल के सामने बड़ी सी इमारत में। गगास से बग्वालीपोखर में पढ़ने वाले बच्चों को रेला निकलता था। सड़क तो थी नहीं, पैदल ही आना होता था।
हमारे लिये यह सुखद था कि हम इतिहास के एक पूरे कालखंड से साक्षात्कार करने वाले क्षेत्र में रहते-पढ़ते थे। मानसखंड में गगास नदी का विषद वर्णन है। मानसखंड में दूनागिरि क्षेत्र ‘नागार्जुन’ और ‘विभाण्डेश्वर’ नामक तीर्थो का जिक्र है। बताते हैं कि बह्मा की आज्ञा से देवधेनु ‘सुरभि’ और ‘नंदिनी’ के साथ नागार्जुन पर्वत पर आई और वहां से पुण्य सलिला नदी का रूप धारण कर लिया। द्रोणगिरि के चरणों से निकली ‘नंदिनी’ जब ‘सुरभि’ के साथ संगम करती है तो ‘ब्रह्मतीर्थ’ कहलाता है। ‘सुरभि’ का मध्य भाग ‘द्रोणतीर्थ’ के नाम से प्रसिद्ध है।
मानसखंड में यह भी कहा गया है कि नागार्जुन पर्वत से निकली हुई ‘सुरभि’ नदी और द्रोणागिरि के निचले भाग से बहने वाली ‘नंदिनी’ नदी के मध्य भाग में ‘भिमाण्डेश्वर’ महादेव स्थित है। द्रोणगिरि पर्वत से एक तीसरी नदी के उद्गम का भी मानसखंड में उल्लेख मिलता है, जिसका नाम ‘वैताली’ है जो रामगंगा से जा मिलती है। शतधारा नदी के साथ संगम रचाने वाली चौथी नदी का नाम ‘शुक्रवती’ है, जो द्रोणगिरि के निम्न भाग से निकलती है और वर्तमान में उसे ‘सुरणा गाड़’ कहा जाता है। इन चारों नदियों के अतिरिक्ति ‘सरस्वती’, ‘गोमती‘ और ‘सर‘ नामक अन्य नदियों का मूल स्रोत भी द्रोण पर्वत ही रहा है। अंग्रेज विद्वान अठकिन्सन के अनुसार द्रोण के ऊपर ‘ब्रह्ममपर्वत’ है जहां से ‘गार्गी’ अथवा ‘गगास’ नदी का उद्गम है। गर्ग ऋषि ने इस स्थान पर आश्रम बनाकर तपस्या की थी।
जनश्रुति के अनुसार इस स्थान पर दु:शासन कौरव आया था। उसने पर्वतों के राजा को जीतकर ‘शतधारा’ एवं ‘शुकवती’ के संगम पर स्नान किया और वहां ‘दु:शासनेश्वर’ शिवलिंग की स्थापना की। इस पौराणिक स्थान की पट्टी अठागुली में बासुलीसेरा के निकट स्थित ‘शुकेश्वर’ महादेव के रूप में पहचान की जाती है। अठकिन्सन द्वारा हिमालय गजैटियर में दी गई उपर्युक्त सूचना का यदि मानसखंड के ‘शुकेश्वर महात्म्य’ के साथ मिलान किया जाए तो तथ्य तथा घटनायें प्रमाणिक सिद्ध होती हैं। ब्रह्मपर्वत के प्रसिद्ध तीर्थ स्थानों और नदियों का वर्णन करते हुये व्यास कहते हैं कि इसी पर्वत के ऊपरी भाग में प्रतिष्ठित गर्गाश्रम से ‘गार्गी’ नदी निकलती है और ‘रथवाहिनी’ (रामगंगा) में मिल जाती है। ‘गार्गी’ नदी के उद्गम स्थल पर गगार्चार्य का आश्रम स्थित है। मानसखंड में इस तथ्य की पुष्टि होती है कि पांडवकाल में भी ‘शतधारा’ और ‘शुकवती’ नदियों के संगम स्थल पर ‘शुकेश्वर महादेव’ का विशेष महात्म्य रहा है।
जब हम द्रोणगिरि का वर्णन करते हैं तो हमें पर्वतों और नदियों का एक व्यापक और गुंथा हुआ तीर्थ-दर्शन मिलता है। द्रोणागिरि की भौगोलिक परिस्थितियों के आलोक से हमें नागार्जुन, भिमाण्डेश्वर, शुकेश्वर आदि पौराणिक तीर्थो के भौगोलिक परिवेश का पता चलता है। उदाहरण के लिये ‘शकवती’ नदी द्रोणगिरि से निकलती है। ‘शतधारा’ के साथ मिलने पर ‘शुकेश्वर महादेव’ के भौगोलिक रूप पर प्रकाश डालती है। यही शुकवती जब ‘गार्गी’ (गगास) से मिलती है तो वह संगम ‘वटेश महादेव’ कहलाता है। वर्तमान में यह तीर्थ ‘मणकेश्वर’ कहलाता है जो पारकोट ग्रामसभा में स्थित हैं। गगास नदी का रामगंगा और कोसी के बीच भी घनिष्ठ रिश्ता है। बद्रीदत्त पांडे ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘कुमाऊं का इतिहास’ में इसका जिक्र किया है।
इस कथा के अनुसार देवतागण द्वाराहाट को द्वारिका बनाना चाहते थे। इसके लिये कोसी और रामगंगा को द्वाराहाट में मिलने का निर्देश हुआ। कहते हैं कि गगास नदी ने रामगंगा को संदेश देने का काम ‘छाना गांव’ के पास सेमल के वृक्ष को सौंपा। जब रामगंगा द्वाराहाट की ओर मुड़ने के मार्ग पर पहुंची तो संदेश देने वाला सेमल का पेड़ सो गया। वृक्ष की जब नींद खुली तो तब तक रामगंगा तल्ला गेवाड़ जा चुकी थी। सेमल के पेड़ ने गगास का संदेश रामगंगा को कहा लेकिन रामगंगा ने लौटने में असमर्थता जता दी। इस कारण द्वाराहाट द्वारिका नहीं बन पायी। गगास को लेकर सुप्रसिद्ध उपन्यासकार जगदीश चन्द्र  पांडे ने ‘गगास के तट पर’ हिन्दी का महत्वपूर्ण उपन्यास लिखा जिसे हिन्दी साहित्य की कालजयी रचना माना जाता है।
इस प्रकार द्रोणगिरि और गगास घाटी के अपने सांस्कृतिक संबंध है। यहां से निकलकर गगास नदी अपनी लगभग डेढ सौ किलोमीटर की यात्रा कर भिकियासैंण में रामगंगा से मिलती है। गगास अकेले नहीं चलती है उसमें कई जलधारायें मिलती हैं जैसे अलकनंदा में पंच प्रयाग। ये जलधारायें जहां-जहां मिलती हैं वहां एक तीर्थ बन जाता है। पारकोट में गगास मे शुकावती नदी मिलती है इस संगम को ‘मणकेश्वर’ के नाम से जाना जाता है। बासुलीसेरा में ‘फुल्केश्वर’ है यहां पर नराई गाड़ और बेनाली गाड मिलते हैं। छाना-दुगौड़ा में ‘गार्गेश्वर’ है, यहां पर मल्या नदी गगास से मिलती है। मनेला-गगास में पिण्डेश्वर संगम पर मौना गाड़ मिलती है। मकडौं-पीपलटांडा में कुटेली मिलती है जिसे ‘कोटेश्वरी’ महादेव कहा गया है।  दलमाड़-कोट्यूड़ा में गगास से दोसाद गाड मिलती है, जहां पर ‘गोगेश्वर’ के नाम से शिव मंदिर है। आगे चलकर चंदास, रिस्कोई और बलवागाड़ के अलावा और भी बहुत छोटी-छोटी धारायें हैं जो गगास को समृद्ध करती हैं।
गगास घाटी ने अपने उद्गम से लेकर रामगंगा से मिलने तक एक विस्तृत समाज बनाया है। दूनागिरि से लेकर भिकियासैंण तक की एक बड़ी आबादी का इसके साथ निकट का रिश्ता है। इस पूरी घाटी में द्वाराहाट, ताड़ीखेत, और भिकियासैण विकासखंड के सौ से अधिक गांव हैं। सुरणा, बिन्ता, भतौरा, तैल-मैनारी, पारकोट, कामा, कनलगांव, नौलकोट, बाड़ी, धमोली, रवाड़ी, रावलसेरा, ईड़ा-थामड़, डोटलगांव, मेल्टा, भंडरगांव, सकूनी, पनेरगांव, उडगल, हाट, नौसार, धनखलगांव, बगूना, दुगौड़ा, च्याली, बाटकोटली, बिष्ट कोटली, छाना, भेट, गढौली, चमना, मनेला, ऐराड़ी, मकडौं, पीपलटांडा, मटेला और कोटुली, दलमाड़ जैस गांवों का एक बड़ा समाज है, जिसकी गगास नदी पर निर्भरता है। कुल मिलाकर गगास हमारी ऐतिहासिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिकी की धारा है। यह हमारे अस्तित्व और स्वाभिमान से भी जुड़ी है।
हमारे पास कैरारो पट्टी में एक गांव है पारकोट। इसे पुराने वैद्यों का गांव माना जाता है। देवता नचाते समय भी ‘पारकोट की जड़ी’ का जिक्र आता है, जिससे पता लगता है कि यहां कि वैद्य परंपरा बहुत पुरानी और समृद्ध रही होगी। यहां के कई पांडे परिवार उत्तर प्रदेश के अनूपशहर में भी बस गये वहां भी उनकी वैद्यकी बहुत प्रसिद्ध हुयी। बग्वालीपोखर में अंग्रेजों के समय का पोस्ट आॅफिस था। पहाड़ की सबसे पुरानी धर्मशालाओं में एक बग्वालीपोखर में है। यह धमार्शाला 1870 से 1880 के बीच बनी है। जिला पंचायत की सड़क जिसे लोग घोड़ी सड़क के रूप में भी जानते थे वह पुराना तीर्थाटन मार्ग रहा। यहीं सकूनी गांव में प्राचीन शिवालय है। कुंवाली में प्राचीन बिष्णु का मंदिर है, जिसे हम ‘आदि बदरीनाथ’ के नाम से जानते हैं। उदयुपर के ‘गोलज्यू’ से लेकर छाना के गोलू तक न्याय देवता की मान्यता है। रामकोट से लेकर एडद्यो तक आस्था और सांस्कृतिक रूप से यह क्षेत्र प्राचीन समय से ही समृद्ध रहा। बताते हैं कि बासुलीसेरा की जमीन भी बदरीनाथ को चढ़ाई गई थी, इसलिये यहां से उसका हिस्सा भी बाद तक जाता रहा।
इतिहास के कुछ और अंदर झांकें तो लगभग 1747 से लेकर 1790  यह क्षेत्र सुर्खियों में रहा। तब कुमाऊं में चंदों का शासन था। यह कुमाऊं-गढ़वाल की राजनीति में उथल-पथल का दौर था। उस समय कुमाऊं की राजनीति को अपने इशारे पर चलाने वाले दो जोशी छत्रपों हरिराम जोशी और शिवदेव जोशी के बीच सात युद्ध हुये जिनमें पांच लड़ाइयों में शिवदेव ने विजय पाई और दो में हरिराम जोशी ने। बताया जाता है कि आखिरी लड़ाई बासुलीसेरा में गगास और दोसाद के संगम पर हुई। इस लड़ाई में हरिराम जोशी का पुत्र जयराम मारा गया। 1500 के लगभग सेना मारी गई। एक और युद्ध इसी दौर में प्रद्युम्नशाह जो गढ़वाल के राजा ललित शाह का पुत्र था चालाक राजनीतिज्ञ हर्षदेव जोशी की कूटनीति के कारण बाद में यह प्रद्युमचंद के नाम से कुमाऊं की गद्ी पर बैठा और मोहनचंद की सेना के बीच बग्वालीपोखर में हुआ था। इस युद्ध का नेतृत्व मोहनचंद के भाई लालसिंह ने किया था। अनुमान लगाया जाता है कि यह युद्ध वर्तमान चपड़ा स्थान में हुआ था जहां आजकल स्टेट बैंक है। बताते हैं कि यह सेना बारिश के कारण यहां की चिकनी मिट्टी में खिसककर बग्वालीपोखर तक चली गई थी। इस युद्ध में मोहनचंद को हार का सामना करना पड़ा।
बग्वालीपोखर का और भी इतिहास है। इतिहास के कई अध्येताओं ने यहां की पुरातात्विक खोजें की हैं। इनमें धनखलगांव और गगास घाटी में कई पुरातात्विक महत्व की चीजें प्राप्त हुई हैं। यहां गोफा गांव में प्राचीन किले के अवशेष भी मिले हैं। यहां कामा ‘पीरों की गढ़ी’ रही है। यहां नाथ संप्रदाय की अपनी रियासत थी। इस रियासत का एक हिस्सा बाड़ी गांव भी है। बिन्ता के कैड़ा, तैल-मैनारी के कार्की, नौलाकोट के बोरा, डोटलगांव के शाही, भंडरगांव के भंडारी, छाना के रौतेला, हाट-नौसार के बडेसी और कठायत लोंगों का यहां के इतिहास में बड़ा योगदान है। सकूनी और रतगल में अधिकारी ब्राह्मण हैं तो बहुत सारे अन्य समाजों ने भी यहां अपनी तरह का योगदान दिया है। रवाड़ी, बाड़ी, पारकोट के साह और चौधरी परिवार यहां की सांस्कृतिक और सामाजिक चेतना की धुरी रहे हैं। भंडरगाव के अलावा कुंवाली के पास मुसलमानों के गांव यहां की सामाजिक और धार्मिक सह अस्तित्व की थाती हैं।
आजादी के आंदोलन के दौर में बग्वालीपोखर में 1921 में हुये कुली बेगार के खिलाफ आंदोलन में भूमिका रही है। इतिहास बताता है कि यहां कुली बेगार के नायकों ने दो बड़ी सभायें की थी। जब उत्तराखंड राज्य आंदोलन का शुरूआती दौर था तो विश्व प्रसिद्ध वैज्ञानिक और कुमाऊं विश्वविद्यालय के कुलपति रहे डॉ. डीडी पंत, जसवंत सिंह बिष्ट और विपिन त्रिपाठी ने यहां सभायें की और अपने साथ कई लोगों को जोड़ा। अस्सी के दशक में जब ‘नशा नहीं, रोजगार दो आंदोलन’ चला तो इस क्षेत्र की उसमें महत्वपूर्ण भूमिका रही। इतिहास पर बाकी बातें फिर कभी, अभी ‘बग्वाली’ मेले के बारे में।
हम लोग बग्वालीपोखर में रहते थे। पिताजी यहां के इंटर कॉलेज के संस्थापक प्रधानाचार्य थे। शुरूआत में चपड़ास्थान में रहे। यहां के पंचायत घर में। हरिशरण शर्मा जी और कुंदन सिंह मेहता जी शायद पहले अग्रज रहे होंगे जिनकी मैंने उंगली पकड़ी। उनसे आज तक आत्मीय और पारिवारिक रिश्ता बना है। यहीं लगता था बग्वाली का मेला। मेले में आने वाले लोगों का एक ही रास्ता था ‘घोडी रोड’, जिससे लगा हुआ पंचायत घर था। बालपन में सजी-धजी महिलाओं एवं बच्चों को देखना भी कौतूहल था। हमारे लिये ‘बग्वाली’ मेला दुनिया का ‘सबसे बड़ा’ मेला था। इतने सारे लोगों को एक साथ देखना भी कम रोचक नहीं होता था। जब शाम को लोग मेले से वापस जाते तो नजारा देखने लायक होता। पैसा तो उन दिनों लोगों के पास ज्यादा था नहीं, लेकिन अपनी हैसियत के हिसाब से सबके पास कुछ न कुछ होता। सभी विजेताओं की तरह से अपने घरों को लौटते। सकून के साथ, उन्मुक्तता के साथ। जब कुछ होश संभाला तो हम भी बग्वाली मेला जाने लगे। पहली बार ‘पिपरी’ हमने इसी मेले में बजाई। जलेबी तो हमने गगास में भी खा ली थी। ‘चरखा’ पहली बार यहीं देखा। ‘चरखे’ में बैठकर हमें लगता था हमने ‘अगास’ छू लिया।
बग्वाली मेले में जाते-जाते हम बड़े हो गये थे। एक बार यहां सरकश भी लगा। पहली बार हमने बौनों को देखा। सुंदर बालाओं को देखकर हमें लगता किसी परीलोक में आ गये हैं। एक बार मौत का कुंआ भी आया। एक सप्ताह तक साइकिल में ही रहने-खाने वाले व्यक्ति को भी यहीं देखा। वह साइकिल में चक्कर लगाता और सूफी गीत चल रहा होता- ‘दमादम मस्त क़लन्दर, अली दम-दम दे अन्दर!…..।‘ यह गीत हमने पहली बार सुना। ‘गद्दू’ का चश्मा पहनकर ‘देवानन्द’ भी यहीं बने।
संदर्भ
1. कुमाऊं का इतिहास, लेखक: बद्रीदत्त पांडे
2. दूनागिरी: इतिहास और संस्कृति, लेखक: डॉ. मोहन चन्द्र तिवारी
3. हिमालयन गजेटियर, लेखक: अठकिंसन, हिन्दी अनुवाद: प्रकाश थपलियाल

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