अब नहीं सहेंगे नेरूजी (पुराना व्यंग्य)

bhiनेरू जी, बस बहुत हो गया। आपने हमें इतना शर्मिन्दा कर दिया है कि आपके नाम के आगे आदरणीय लिखने तक का जी नहीं करता। बदमाशी की भी कोई सीमा होती है। अब तो हालत ये हो गई है कि आपको अपना पूर्व प्रधानमंत्री कहते हुए भी हमारा सिर शर्म से झुक जाता है, वो तो शर्म ही बेशर्म है कि फिर भी आती ही रहती है।

सुनिये नेरूजी, मैं, इस देश का एक नागरिक आपकी इन तमाम बदमाशियों के बावजूद आपके साथ नरमी से पेश आ रहा हूं और आपसे सीध-सपाट शब्दों में कह रहा हूं कि हमारा वो सारा सामान लौटा दीजिए, जो आप ले गये हैं।

कल ही आप हमारे उन जूट के थैलों को उठाकर ले गये, जिनके सिरे पर हम जूट की सुतली बांधते थे और ठीक उस सुतली पर लाख पिघला कर डालने के बाद डाकखाने की मुहर लगा देते थे। उस थैले में जो बड़ी संख्या में चिट्ठियां थी, उन्हें बेशक आप अपने पास रखें, क्योंकि अब हमारे पर जियो धन धना धन है, अब हम चिट्ठी नहीं लिखते। लेकिन, उन चिट्ठियों के बीच चमड़े के काले रंग का जो कैश रखने वाला बैग था, उसे तुरन्त लौट दें। उस बैग में हमने 15 हजार करोड़ रुपये रखे हुए थे।

और सुनिये साहब! वो जो आप जेट एयरवेज के हवाई जहाजों के टायर खोलकर ले गये हैं न, उन्हें भी तुरत लौटा दीजिए। बाकी हिसाब तो हम आपसे बाद में करते ही रहेंगे। जो-जो बदमाशियां आप करते रहे हैं, उन सबका हिसाब है हमारे पास। यदि आप ने जल्द ये चीजें नहीं लौटाई तो हम भूल जाएंगे कि आप पंडित हो। पंडित होने का ये मतलब नहीं है कि आप हमारे पिछड़ा परिधान मंत्री जी को कोई काम ही न करने दो। पिछले चुनाव में कितने वायदे किये थे उन्होंन। आपने खुद तो कुछ किया नहीं, अब ऊपर बैठे-बैठे उन्हें भी काम नहीं करने दे रहे हैं। इसे मेरी आखिरी चेतावनी जाने…..

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