खेती चौपट, सरकार मौन

पहाड़ों में वन्य जीवों के कारण 50 प्रतिशत लोगों ने छोड़ दी है खेती

भारतीय वन्यजीव संस्थान ने एक सैंपल सर्वे उत्तराखंड के 15 गांव में किया है, जिसके नतीजे बहुत ही चौंकाने वाले हैं और इस तरफ इशारा करते हैं कि यदि जल्द से जल्द जंगली जानवरों को आबादी वाले क्षेत्रों से हटाया नहीं गया तो उत्तराखंड में खेती किसानी पूरी तरह से खत्म हो जाएगी। इस सर्वे की जानकारी भारतीय वन्यजीव संस्थान के वैज्ञानिकों ने 21 नवंबर, 2022 को राज्य के अपर मुख्य सचिव आनंद वर्धन की अध्यक्षता में हुई बैठक में दी। इस बैठक का मुख्य मुद्दा राज्य में मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम करना था।

अपर मुख्य सचिव कहा था कि मानव वन्यजीव संघर्ष कम करने के लिए एक पायलट प्रोजेक्ट बनाया जाए। इसके लिए 5 गांवों को चिन्हित किया जाए और मानव-वन्य जीव संघर्ष की स्थिति, तीव्रता और समाधान की उपाय तलाशे जाएं। यह आदेश जलागम विभाग को दिया गया था। लेकिन, भारतीय वन्यजीव संस्थान के वैज्ञानिकों ने कहा कि वे पहले से इस तरह का एक सैंपल सर्वे कर रहे हैं। यह सैंपल सर्वे अल्मोड़ा, देहरादून, हरिद्वार, नैनीताल और पौड़ी गढ़वाल जिलों में किया जाएगा। फिलहाल सैंपल सर्वे पौड़ी गढ़वाल जिले के 15 गांव में किया गया। ये वे गांव हैं जिनमें मानव-वन्यजीव संघर्ष की सबसे ज्यादा 17 घटनाएं हाल के वर्षों में हुई हैं। इन 15 गांव में गोहरी फॉरेस्ट रेंज मैं स्थित में स्थित गंगा भोगपुर, लालढांग फॉरेस्ट रेंज में स्थित किमसर, देवराना, धारकोट, अमोला, लचिया, रामजीवाला, केस्था, गुमा, कांडी, दुगड्डा में स्थित केमुसेरा, सैलानी, पुलिंडा, दुराताल, और लैंसडौन सीमा में कलेथ गांव शामिल हैं।

ऐसे खेत अब पहाड़ों में बहुत मुश्किल से मिलते हैं।

सैंपल सर्वे की रिपोर्ट का हवाला देते हुए बताया गया कि जिन गांव में सर्वे किया गया, वहां लोगों ने गेहूं का उत्पादन बंद कर दिया है। क्योंकि गेहूं को जंगली जानवर पूरी तरह से चट कर जाते हैं। गेहूं को सबसे ज्यादा नुकसान जंगली सूअर, बंदर और भालू पहुंचा रहे हैं। ग्रामीणों ने अब गेहूं की जगह मंडुवा, हल्दी और मिर्च का उत्पादन शुरू कर दिया है। हालांकि गाने यह नहीं बता पाए कि इन फसलों के उत्पादन से उन्हें कुछ लाभ होगा या नहीं, क्योंकि अभी ग्रामीण इन फसलों के मामले में पूरी तरह अनुमान नहीं लगा पाए हैं।

सैंपल सर्वे की रिपोर्ट बताती है कि 50 प्रतिशत गांवों में 60 से 80 प्रतिशत फसलें वन्य जीव नष्ट कर रहे हैं। इन सभी गांव में ग्रामीणों ने कहा कि यदि वन्य जीवो द्वारा फसलें नष्ट नहीं की जाती तो कृषि कार्य उनके लिए लाभदायक था। जिन 15 गांवांे में यह सैंपल सर्वे किया गया, वहां 50 प्रतिशत कृषि क्षेत्र अब बंजर हो गया है। लोगों ने यहां खेती करनी पूरी तरह से छोड़ दी है।

हालांकि बहुत छोटा सा है, केवल 5 गांव का। लेकिन, यह बता रहा है कि उत्तराखंड में मानव-वन्यजीव संघर्ष की स्थिति कितनी भयावह है और इससे लोगों की जान ही नहीं, बल्कि खेती भी खतरे में है। उत्तराखंड में मानव-वन्यजीव संघर्ष की घटनाएं तेजी से बढ़ी हैं। इस मामले पर लोगों का आक्रोश बार-बार सामने आता रहा है, लेकिन सरकारों ने अभी तक इस तरफ ध्यान देने की जरूरत नहीं समझी। खास बात यह है कि अब भी अपर मुख्य सचिव केवल मानव-वन्यजीव संघर्ष के मामलों का अध्ययन करने, इस पर लोगों की धारणाओं के बारे में जाने और इससे होने वाले नुकसान का डॉक्यूमेंटेशन करने की ही बात कर रहे हैं।

समझा जा सकता है कि यह सरकारी सर्वे कब पूरा होगा, कब रिपोर्ट बनेगी, तब सरकार को दी जाएगी और कब सरकार इस पर कोई कदम उठाएगी? उठाएगी भी या नहीं उठाएगी, यह भी भविष्य के गर्भ में है? कुल मिलाकर राज्य में खेती का चौपट होना तो तय है, पलायन भी और तेजी से बढ़ने वाला है। पहाड़ों में अब लोगों की जान भी सुरक्षित नहीं है। पिछले दिनों अल्मोड़ा जिले के मार्चूला में एक बार एक बाघिन जिस तरह बाजार के डस्टबिन पर खाना तलाश रही थी, जिसे गोली से मार दिया गया, इस घटना से साफ है कि वन्यजीवों के लिए अब वनों में भोजन नहीं है। वे अब आबादी की तरफ आ रहे हैं और जाहिर है वे पशुओं को भी नुकसान पहुंचाएंगे और मानव जीवन को भी।

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