मेरी आत्मकथा (व्यंग्य)

TriLochan Bhatt

 

लिखूं या न लिखूं? लेकिन मुझे लगता है कि अब मुझे अपनी आत्मकथा लिख ही लेनी चाहिए। अब इसमें कोई शक-सुबहा नहीं रह गया है कि मैं या तो बड़ा लेखक बन गया हूं, या बनने ही वाला हूं। ऐसा मैं कोई हवा में नहीं कह रहा हूं, बल्कि यदि मैं ऐसा कह रहा हूं और मान रहा हूं तो इसके लिए मेरे पास पर्याप्त सबूत मौजूद हैं।

पिछले दिनों मैंने दो गंभीर किस्म के लेख लिखे, और ये दोनों लेख एक गंभीर प्रवृत्ति के अखबार ने अपने अतिगंभीर किस्म के संपादकीय पेज पर अत्यधिक सम्मानजनक स्थिति में छापे और बाकायदा पारिश्रमिक भी भेजा, जिसकी पावती रसीद अब भी मेरे पास है और आप चाहें तो उसे प्रमाण स्वरूप देख सकते हैं। वैसे कुछ साल पहले एक और लेख एक अखबार में छपा था, ये दीगर बात है कि आज तक उसका पारिश्रमिक नहीं मिल पाया है। इसके अलावा मैं जिस अखबार में काम कर रहा हूं, उसमें कुछ न कुछ लिखता ही रहता हूं, हालांकि यहां मैं वही खिलता हूं, जो लिखने के लिए कहा जाता है, उस लिखे का कोई खास मकसद भी नहीं होता, फिर भी लिखना तो लिखना होता है और मैं कई सालों से यूं ही लिख रहा हूं, इसलिए यह साबित हो जाता है कि मैं बड़ा लेखक बन गया हूं। इसके अलावा कुछ और ऐसी बातें हैं, जो यह साबित करती हैं कि मेरा दावा गलत नहीं है, जैसे कि तमाम हिन्दी वालों की तरह मैं भी किताबें पढऩे की जरूरत नहीं समझता और मानता हूं कि मैं पैदायशी विद्वान हूं। अपने दौर के कई लेखकों की तरह ही मैं भी हिन्दी के अनेक बड़े लेखकों के नाम जानता हूं। इनमें प्रेमचंद से लेकर मेरी नाम राशि त्रिलोचन शास्त्री तक शामिल हैं। इतना सब होने के बावजूद भला आप मुझे और मैं खुद को बड़ा लेखक क्यों न माने?

अब जब यह बात हो ही गई है, यानी कि मैं बड़ा लेखक बन ही गया हूं तो जरूरी है कि मैं आत्मकथा लिखूं। मैं नहीं चाहता कि मेरे बाद के लेखकों को मेरी जीवनी के लिए इधर-उधर भटकना पड़े। मैं शरतचंद जैसे लेखकों से कतई सहमत नहीं हूं जिन्होंने देवदास और श्रीकांत जैसे उन व्यक्तियों को तो अमर कर दिया, जो इस सृष्टि में पैदा ही नहीं हुए, लेकिन अपने बारे में कभी कुछ नहीं लिखा। इसी का नतीजा था विष्णु प्रभाकर को उनके बारे में जानकारी एकत्रित करने के लिए दर-दर भटकना पड़ा। भविष्य के किसी विष्णु प्रभाकर को मेरे जैसे आवारा मसीहा की जीवनी लिखने के लिए सारी सामग्री एक ही जगह मिल जाए, इसलिए मैं आत्मकथा लिख रहा हूं। वैसे भी आने वाले दौर के लेखक हाईटेक लेखक होंगे और उनके पास इतनी फुर्सत नहीं होगी कि अपने पूर्ववर्ती किसी लेखक के बारे में जानने के लिए विष्णु प्रभाकर बनें।
आत्मकथा लिखने से पहले आप सुधी पाठकों को मैं यह बताना जरूरी समझता हूं कि मैंने लिखना कब शुरू किया और किसकी प्रेरणा से, ताकि सनद रहे और हिन्दी साहित्य के अध्यापक इसे छात्रों को बताने के लिए एक प्रेरक प्रसंग की रूप में इस्तेमाल कर सकें। मैंने आम लेखकों की तरह लेखन की शुरुआत पद्य नहीं की, बल्कि मैंने शुरुआत ही गद्य से की। अपने स्कूल की लड़कियों के नाम प्रेमपत्र के रूप से रचित वे गद्य रचनाएं दुर्भाग्य से आज उपलब्ध नहीं हैं। इनमें से ज्यादातर साहित्य तो मैंने संबंधित लड़की को दिए बिना खुद ही नष्ट कर दिया और जो लड़कियों को किसी तरह थमाए, उनमें से भी ज्यादातर के आज तक जवाब नहीं मिल पाए और अब मिलने की कोई संभावना भी नहीं है, कारण कि मेरी ही तरह तरह ही वे लड़कियां भी अब 40 के पार पहुंच गई होंगी और कुछे· तो नानी भी बनने वाली होंगी। खैर।
उस प्रेमपत्र साहित्य की हर बार इसी तरह उपेक्षा हुई हो ऐसा भी नहीं है, इनमें से कुछ साहित्य पढ़ा भी गया और उस पर प्रतिक्रियाएं भी भेजी गई। एक लड़की, जो उम्र में मुझसे बड़ी थी और शायद समझदार भी थी या खुद को समझदार मानती थी, उसने लिखा- यह समय पढ़ाई पर ध्यान देने का है, अभी से इस तरह की बातों में पड़कर भविष्य खराब कर रहे हो। बुरा न मानना और समझना कि तुम्हारी बड़ी बहन ने लिखा है। उसके बाद उस लड़की के आसपास फटकने तक की हिम्मत नहीं जुटा पाया।

एक अन्य लड़की ने बड़ा ही जोरदार जवाब भेजा था। पढ़कर लगा कि वह तो बेचारी जन्म जन्मान्तर से मेरी प्रतीक्षा कर रही है और मैं हूं कि अब जाकर उस विरहणी की सुध ले रहा हूं। वह पत्र हिन्दी साहित्य को समृद्ध करने के दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण साबित हो सकता था, लेकिन दुर्भाग्य देखिए कि वह पत्र मेरे पिताजी के हाथ लग गया। उस दुर्घटना के चलते उस रचना को नष्ट कर दिया गया। बहरहाल मैं किसी तरह से नष्ट होने से बच गया, शायद हिन्दी साहित्य की सेवा करने के लिए।

उस पत्र की शुरुआत बड़ी ही मार्मिक और साहित्यिक पंक्तियां लिखकर की गई थी, पढ़कर मेरी आंखें नम हो गई थीं। लिखा था – मेज में घड़ी रखी, समय बताती चार, पत्र पढऩे से पहले तुम्हें मेरा नमस्कार। पत्र आगे पढऩे से पहले मैं देर तक उस सिचुएशन की कल्पना करता रहा था। मेज का आकार-प्रकार, घड़ी का मॉडल, कमरे की स्थिति, सभी कुछ आज भी मेरी कल्पना में है, लेकिन एक बात जो आज भी तय नहीं कर पाता वह यह कि उस समय चार शाम के बज रहे होंगे, या सुबह के? पत्र की अंतिम पंक्तियां तो और भी दिल फाड़ देने वाली थीं – चप्पल में चप्पल, चप्पल में बाटा, औरों को नमस्ते, तुमको टाटा।

बहरहाल। इस दुर्घटना के बाद काफी समय तक मेरी साहित्य साधना बाधित रही। हिन्दी साहित्य जगत को इससे कितना नुकसान हुआ, यह बताना मुश्किल है और उसकी भरपाई कर पाना भी असंभव है। स्कूल के बाद कॉलेज पहुंचा तो मेरे अंदर का साहित्यकार फिर जोर मारने लगा। अब पहले जैसी दुर्घटना का खतरा काफी कम हो गया था, क्योंकि कॉलेज घर से दूर था और मुझे वहीं एक किराए का कमरा लेकर दे दिया गया था। वहां रहकर मैं पढ़ाई से ज्यादा साहित्यकर्म में ही जुटा रहता था। वैसे भी हिन्दी में बड़ा लेखक बनने के लिए पढऩे की ज्यादा जरूरत नहीं होती, बस लिखते चले जाना चाहिए। साहित्य सेवा के इस दूसरे दौर में भी मैंने कई लड़कियों को प्रेमपत्र लिखे। कुछ ने जवाब दिया, कुछ ने नाराजगी जताई, कुछ ने एकांत में खरी-खोटी सुनाई और कुछ इससे भी आगे बढ़ीं। वैसे यह बात पूरी तरह से बेबुनियाद और झूठी है कि प्रेमपत्र दिए जाने से नाराज होकर एक लड़की ने मुझे चांटा मारा था। दरअसल यह कहानी उन लोगों ने गढ़ी थी, जो लड़कियों के साथ मेरी नजदीकियों से चिढ़ते थे और मुझसे ईष्र्या करने लगे थे। ऐसे लोगों के बारे में मैं अपने मुख से भला क्या कहूं? परसाई जी कह चुके हैं कि राधा-कृष्ण की रासलीला के प्रसंग पर भक्ति विभोर हो जाने वाले लोग आदमी के मामले में बड़े कंजूस होते हैं।

ऐसा नहीं है कि हिन्दी का इतना बड़ा लेखक बन जाने के सफर में मैंने कविता लिखी ही नहीं, मैंने अपनी एक प्रेमिका के नख-शिख का वर्णन करते हुए एक बार एक लंबी कविता लिखी थी। कविता मैंने उसी को भेंट की थी। मुझे पूरा यकीन है कि वह पांडुलिपि अब तक नष्ट हो चुकी होगी। हो सकता है कि मेरी उस प्रेमिका ने कुछ समय तक उसे अपने पास रखा होगा और बाद में अपनी सहेलियों को दिखाकर उसे फाड़ दिया हो। यह भी हो सकता है कि जरूरत के समय उसने कविता का लिंग परिवर्तन कर और उसमें जरूरी संशोधन कर अपने नए प्रेमी को भेंट कर दी हो और उस नए प्रेमी ने एक बार फिर लिंग परिवर्तन कर उसे अपनी नई प्रेमिका को दे दिया हो। जाहिर ही इतने परिवर्तनों से गुजरने के बाद कविता की मौलिकता में काफी अंतर आ चुका होगा। बाद में उस कविता का क्या हुआ होगा, कोई नहीं जानता।

साहित्य सृजन से जुड़ी एक मजेदार कहानी भी मेरे साथ घटित हुई। पाठकों और भावी लेखकों के हित में मैं यहां उस कहानी का जिक्र करना जरूरी समझता हूं, ताकि वक्त-जरूरत काम आ सके। उस समय मैं कॉलेज का एक साल पूरा कर दूसरे साल में प्रवेश कर चुका था। नए छात्र भर्ती हो चुके थे। एक तय दिन नए छात्रों के परिचय का समारोह होना था। यूं यह था तो परिचय समारोह ही, लेकिन थोड़ा सा रैगिंग जैसा भी किसी-किसी छात्र के साथ हो जाता था।

कॉलेज परिसर के एक हॉल में सभी सीनियर छात्र-छात्राएं, जिनमें मैं भी शामिल था, वृत्ताकार बैठे हुए थे। नए छात्र-छात्राओं को एक-एक करके अंदर आना था और सभी के पास जाकर अपना परिचय देना था। सीनियर छात्र उनसे कुछ पूछ-पाछ लेते थे और मर्जी हुई तो नहीं भी पूछते थे।

जैसा कि होता है, नए छात्रों में कुछ उदंड और घमंडी किस्म के भी थे और सीनियर छात्र इस समारोह की कई दिनों से प्रतीक्षा कर रहे थे ताकि उन्हें सबक सिखाया जा सके। समारोह स्थल से इतर उन्हें कुछ कहा नहीं जा सकता था। लेकिन मैं किसी और वजह से इस समारोह की प्रतीक्षा कर रहा था, मेरे लिए यह एक ऐसा मौका था जब अपनी साहित्य साधना की धाक कॉलेज के छात्रों और खासकर छात्राओं पर जमाई जा सकती थी। वैसे नाचीज के साहित्यकार होने की छिटपुट खबरें कॉलेज में तब तक फैल चुकी थीं।

हालांकि मैंने साहित्य सृजन के नाम पर तब तक केवल प्रेमपत्र ही लिखे थे और इस समारोह में सार्वजनिक रूप से उनका पाठ करना संभव नहीं था, लिहाजा मैंने कुछ शेर-ओ-शायरी की किताबें खरीदीं, उनमें से अच्छे शेर चुनकर कागज के पुर्जों पर उतारे, पत्रिकाओं में छपी सुन्दर लड़कियों की तस्वीरें काटकर साथ में चिपकाईं और उन्हें अलग-अलग लिफाफों में डालकर परिचय समारोह में जा पहुंचा।

समारोह में बाकी छात्र-छात्राएं तो नए छात्रों से पूछा-पाछी में जुट गए, लेकिन मैं नए छात्रों का इस्तेमाल लिफाफों को लड़कियों तक पहुंचाने के काम में करने लगा। मेरे पास जो भी छात्र या छात्रा अपना परिचय देने आते, मैं उसे एक लिफाफा थमा कर सामने बैठी किसी लड़की को देने के लिए कह देता। यह अत्यन्त महत्वपूर्ण कार्य यूं तो ठीक ही निपट गया, लेकिन एक लड़की ने समस्या खड़ी कर दी। उसके पास जो शेर पहुंचा, वह कुछ यूं था- निगाहों में निगाहें न डाला करो इस कदर, वरना ज्यादा दिन न टिक पाएगा ये मंजर, अर्से से रखा है ये दिल तुम्हारे लिए, ले लेना कुछ और जवां होकर।

वह लड़की कई दिन तक मेरे पीछे पड़ी रही कि आखिर उसने कब मेरी निगाहों में निगाहें डाली थीं, उसका आग्रह यह भी था कि वह अब जवां हो चुकी है और मैं उस दिल को, जो कि मैंने अर्से से उसके लिए रखा हुआ है, उसे दे दूं। मैं उसके इस आग्रह को मान भी लेता, क्योंकि इतने सालों तक प्रेमपत्र साहित्य लेखन के अलावा कुछ नहीं कर पाया था, और मेरा भी मन था कि अब मैं दिल उसे दे ही डालूं, लेकिन दिल लेने का जो तरीका उसने बताया वह काफी हिंसात्मक था, उसका कहना था कि मैं अपना दिल काटकर उसे दे दूं। चूंकि मैं हिंसा का विरोधी हूं लिहाजा मैंने ऐसा नहीं किया, लेकिन वह लड़की किस दिन वास्तव में मेरा दिल अपने साथ ले गई, मुझे पता ही नहीं चला। वह तो शुक्र है खुदा का कि ऐन वक्त पर, जब, जैसा कि उस समय होता था, यानी कि प्रेम की परिणति विवाह में होती थी और उस समय प्रेम को तभी सफल माना जाता था, जब शादी हो जाए, इस सामाजिक धारणा के चलते हम लोग, यानी कि मैं और वह लड़की शादी करने की सोच रहे थे, बल्कि करने ही जा रहे थे तो, जैसा कि मैने कहा, शुक्र है खुदा का, उसके बाप ने अड़ंगा डाल दिया और वह जिन्दगी भर मुफलिसी में जीने के अभिशाप से बच गई। मेरा विश्वास है कि वह अब जहां भी होगी, खूब ऐशोआराम से होगी। कम से कम मेरी तरह मुफलिसी में तो कतई नहीं होगी।
मैं आत्मकथा की बात कर रहा था। तो किसी बड़े लेखक की जीवनी या आत्मकथा में जो तत्व आवश्यक हैं, वे सब मेरे पास भी हैं, जैसे कि वह गरीब परिवार में पैदा होता है, बचपन अभावों में गुजरता है, लेकिन पढ़ाई-लिखाई में तेज होता है। इसके अलावा वह कुछ-कुछ उदंड भी होता है और अध्यापक उसकी उदंडता को सिर्फ इसलिए नजरअंदाज कर जाते हैं कि वह पढऩे में तेज होता है। बाजे-बाजे समय में वह क्लास में जाने के बजाए आसपास की झाडिय़ों या खेतों में जाकर छिप जाता है और बीड़ी पीना शुरू कर देता है, कई बार लड़कियों को छेडऩे के ‘झूठे’ आरोप में मार भी खाता है। इस तरह की बातें सभी लेखकों में एक जैसी होती हैं, लिहाजा मैं यहां उन बातों को दोहराना उचित नहीं समझता, ये सब बातें सुधी पाठक किसी दूसरे लेखक की आत्मकथा में भी पढ़ सकते हैं, लिहाजा मैं अपनी आत्मकथा को यहीं विराम दे रहा हूं। लेकिन पाठकों से यह आग्रह जरूर कर रहा हूं कि आप मेरी इस आत्मकथा को पढऩे के बाद मुझे बड़ा लेखक जरूर स्वीकार कर लें। और हिन्दी साहित्य के अध्यापकों से विशेष अनुरोध यह करना चाहूंगा कि प्रयास करें कि मेरी आत्मकथा सिलेबस में लग जाए, इससे एक बड़ा फायदा यह होगा कि अन्य लेखकों की जीवनी की तरह मेरी जीवनी रटते समय विद्यार्थियों को सन् या संवत नहीं रटने पड़ेंगे, भावी विद्यार्थियों इस झंझट से बचाने के लिए ही मैंने अपनी जीवनी में तिथियों का इस्तेमाल नहीं किया है। बाकी समय मिला तो आगे भी कुछ लिखने का प्रयास करूंगा, वरना आप इसी आत्मकथा को मेरी एकमात्र और श्रेष्ठ रचना बताकर विद्यार्थियों को बता सकते हैं कि बहुत लिखने से कोई बड़ा लेखक नहीं बनता, थोड़ा और सारगर्भित लिखकर बड़े लेखकों की श्रेणी में शामिल हुआ जा सकता है, जैसे कि त्रिलोचन भट्ट की यह आत्मकथा।

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