पीत पत्रकारिता बनाम पेड न्यूज और आधुनिक पत्रकारिता

पीत पत्रकारिता अर्थात ऐलो जर्नलिज्म पत्रकारिता में लम्बे समय से प्रचलन में रहा है। जब कोई पत्रकार व्यक्तिगत कार्य सिद्धि अथवा आर्थिक लाभ के लिए किसी के पक्ष या विपक्ष में खबर लिखता है तो उसे पीत पत्रकारिता कहा जाता है। वर्तमान दौर में पीत पत्रकारिता शब्द आमतौर पर सुनाई नहीं देता और इसकी जगह पेड न्यूज शब्द चलन में आ चुका है। पेड न्यूज दरअसल पीत पत्रकारिता का एक संस्थागत स्वरूप है। इसमें किसी पत्रकार का ही नहीं, उसके संस्थान का भी लाभ जुड़ा होता है। कहना न होगा कि आज अखबारों में प्रकाशित होने वाले अथवा टेलीविजन पर प्रसारित होने वाले समाचारों के एक बड़े हिस्से को पेड न्यूज की श्रेणी में रखा जा सकता है। ये इन माध्यमों में प्रकाशित- प्रसारित विज्ञापनों से अलग है। इन समाचारों के प्रकाशित अथवा प्रसारित किये जाने के ऐवज में उनके संस्थान को जो लाभ प्राप्त होता है वह विज्ञापन के रूप में भी हो सकता है और नकद के रूप में भी, उपहार के रूप में भी और राजनीतिक लाभ के रूप में भी।

भारतीय पत्रकारिता में पेड न्यूज का कॉसेप्ट करीब दो दशक पुराना है। यह सिलसिला चुनावों से शुरू हुआ था और बाद में अन्य सभी क्षेत्रों तक पहुंच गया। दरअसल अखबारों और समाचार चैनलों के लिए चुनाव का वक्त अधिक से अधिक राजस्व प्राप्त करने का मौका होता है। पहले उम्मीदवारों के विज्ञापन प्रकाशित कर राजस्व अर्जित कर लिया जाता था, लेकिन चुनाव आयोग की ओर से उम्मीदवारों के लिए खर्च की सीमा तय कर दिये जाने के बाद समाचार माध्यमों में इतना विज्ञापन देना संभव नहीं हो पाया। इससे एक ओर जहां समाचार संस्थानों को नुकसान हुआ, वहीं दूसरी ओर अमीर उम्मीदवारों को भी प्रचार-प्रसार ठीक से न हो पाने की कमी सालने लगी। इसी जरूरत ने पेड न्यूज का नया रास्ता निकाला। 1990 के अंतिम वर्षों में चुनाव प्रचार के लिए शुरू हुआ पेड न्यूज का कॉन्सेप्ट अगले कुछ वर्षों में तेजी से फैला

देहरादून के वरिष्ठ पत्रकार त्रिलोचन भट्ट पेड न्यूज के मामले में 2005 में हुए हरियाणा विधानसभा के चुनाव को याद करते हैं। वे कहते हैं कि यह वह दौर था जब चुनाव के दौरान पेड न्यूज का दौर अपने चरम पर था। वे उस समय हरियाणा में उस समय एक बड़े अखबार के काम कर रहे थे। चुनाव के दौरान अखबारों ने उम्मीदवारों के लिए पैकेज की व्यवस्था की थी। शुरुआती दौर में इस पैकेज में उम्मीदवारों की सभाओं और जनसंपर्कों की कवरेज के साथ ही एक-दो छोटे विज्ञापन प्रकाशित करना शामिल था, लेकिन संभवतः अखबारों के लिए यह लाभ का सौदा साबित हुआ था, लेकिन वे और ज्यादा पैसा कमाने की फिराक में थे। जल्द ही ये समाचार उम्मीदवारों की जनसभाओं से आगे बढ़कर पेड विश्लेषण तक पहुंच गये और संबंधित क्षेत्र में उम्मीदवार विशेष की ओर मतदाताओं का झुकाव, संबंधित उम्मीदवार की जीत पक्की जैसे समाचार प्रकाशित होने लगे। स्थिति यहां तक पहुंच गई कि अक्सर अखबार के एक ही पेज में एक ही विधानसभा क्षेत्र के दो उम्मीदवारों की जीत पक्की की जाने लगी। वे इसे पत्रकारिता का एक घृणित दौर बताते हैं। मतदान के दिन को याद करते हुए श्री भट्ट कहते हैं, ‘रात को हम लोग सामान्य समाचार भेजकर घर गये थे, लेकिन सुबह जब अखबार मिला तो उसमें एक भी रात को लिखा उनका समाचार नहीं छपा था, बल्कि लगभग सभी पन्नों पर एक पार्टी विशेष की उम्मीदवारों की जीत और उनके पक्ष में मतदाताओं का भारी रुझान होने जैसे समाचार छपे हुए थे’।

पेड न्यूज का यह कान्सेप्ट इतना प्रचलित और अखबार प्रबंधन के लिए इतना लोकप्रिय हुआ कि हर चुनाव से पहले अखबारों के प्रबंधक बाकायदा रेट कार्ड निकालने लगे। जिसमें उम्मीदवारों के लिए छोटे से लेकर बड़े तक कई तरह के पैकेज ऑफर किये जाने लगे। प्रयास यह होता था कि चुनाव लड़ने वाला हर आयवर्ग के उम्मीदवार से कुछ न कुछ पैसा झटक लिया जाए। इससे हुआ यह कि एक अखबार में एक क्षेत्र के कई-कई उम्मीदवार समाचार विश्लेषणों में जीत हासिल करने लगे। यही हालत टीवी चैनलों की भी हुए। आधे घंटे में किसी क्षेत्र का एक उम्मीदवार जीत दर्ज कर रहा होता तो अगले आधे घंटे में उसी क्षेत्र के दूसरे उम्मीदवार की जीत पक्की हो रही होती। पेड न्यूज के कान्सेप्ट का राजनीतिक दलों ने भी बखूबी इस्तेमाल किया। ऐसे कई उदाहरण सामने आए कि जब किसी शहर में किसी पार्टी ने कोई बड़ी जनसभा की और दूसरी पार्टी को लगा कि यह खबर अखबारों के पहले पन्ने पर जगह पा लेगी तो दूसरी पार्टी ने अखबारों का पूरा का पूरा पहला पेज खरीद लिया और उसमें अपने प्रचार से संबंधित खबरें अथवा विज्ञापन छपवा लिये।

पेड न्यूज के इस कॉन्सेप्ट ने रिपोर्टर को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाया। पेड न्यूज का चलन शुरू हुआ तो रिपोर्टर की जरूरत खत्म होने लगी और समाचार सम्पादक के स्तर पर ही मैनेज किये जाने लगे। जल्दी ही अखबारों और टीवी का प्रबंधन इस विधा को सीख गया और सम्पादक भी बीच से हट गया अब समाचार सीधे समाचार संस्थानों के मार्केटिंग विभाग में ही मैनेज किये जाने लगे। आज स्थिति यह है कि समाचार संस्थानों के मार्केटिंग विभाग से पूछे बिना किसी संस्थान के पक्ष में अथवा खिलाफ कोई भी समाचार प्रकाशित करना संभव नहीं रह गया है।

पेड न्यूज को लेकर देश के तमाम वरिष्ठ पत्रकार और बुद्धिजीवी चिन्ता भी जताते रहे हैं और इस चलन को बंद करने के प्रयास भी करते रहे हैं। माना जाता है कि चुनाव के दौरान प्रकाशित-प्रसारित होने वाली पेड न्यूज का मकसद वोटर्स को गुमराह करना होता है। इससे वोटर्स को गलत सूचनाएं दी जाती हैं, परिणाम स्वरूप किसी खास राजनीतिक दल अथवा उम्मीदवार के पक्ष में माहौल बनता है। अंततः चुनाव परिणाम प्रभावित होता है और इस तरह से पारदर्शी चुनाव प्रक्रिया को नुकसान पहुंचने के साथ ही लोकतांत्रिक मूल्यों का भी ह्रास होता है। वरिष्ठ पत्रकारों का मानना है कि जिस मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है वह पेड न्यूज का बढ़ावा देकर पूंजीपतियों का हिमायती बन गया है।

पेड न्यूज की वजहों पर केंद्र सरकार ने तत्कालीन राज्य मंत्री राव इंद्रजीत सिंह की अध्यक्षता वाली पार्लियामेंट्री स्टैंडिंग कमेटी ऑन इंफॉर्मेशन एंड टेक्नोलॉजी ने एक विस्तृत रिपोर्ट पेश की थी। इस रिपोर्ट में उन तमाम पहलुओं का जिक्र है, जिसके चलते पेड न्यूज की बीमारी का चलन बढ़ रहा है। इसके मुताबिक मीडिया में कॉन्ट्रेक्ट सिस्टम की नौकरियों और पत्रकारों का कम वेतनमान भी पेड न्यूज को बढ़ावा दे रहा है। साथ ही मीडिया कंपनियों के स्वामित्व के बदलते स्वरूप का असर भी हो रहा है.इस रिपोर्ट में ये माना गया है कि सरकारी विज्ञापनों के जरिए सरकारें मीडिया हाउसेज पर दबाव बनाती रहती हैं। इस रिपोर्ट में प्रेस काउंसिल जैसी संस्थाओं को प्रभावी बनाने से लेकर नियामक संस्था बनाने तक की बात कही गई है। लेकिन मुख्यधारा की मीडिया में बीते तीन दशकों से ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमाने का जोर बढ़ा है। ऐसे में किसी नैतिकता और आदर्श की बात को बहुत ज्यादा अहमियत नहीं रह जाती है.

अखबारों में जगह बेचने का कॉन्सेप्ट भारत काफी पहले शुरू हो गया था। शुरुआत में अखबार अपने लोकल सप्लीमेंट में मैरिज एनिवर्सरी, बर्थडे पार्टी, मुंडन और शादी जैसी चीजों को छापने के लिए पैसे लते थे। लेकिन ये घोषित तौर पर पेड सप्लीमेंट माने जाने लगे थे और ये वो पन्ने थे जिनमें समाचार नहीं छपते थे।

एंटरटेंनमेंट लोकल सप्लीमेंट में जगह बेचने का कांसेप्ट समय के साथ बदले हुए आज एक बेहद बुरे दौर में पहुंच गया है। मौजूदा समय में साफ नजर आता है कि पूरा का पूरा चैनल या पूरा का पूरा अखबार पेड जैसा बर्ताव कर रहे हैं। किसी को सिर्फ तारीफ ही तारीफ दिख रही है तो किसी को केवल आलोचना ही आलोचना। यही वजह है कि कुछ दशक पहले जिस पत्रकारिता को सम्मानजनक दृष्टि से देखा जाता था, जिन पत्रकारों को समाज के हर क्षेत्र में सम्मान मिलता था, आज उन्हें सरेआम अपशब्द कहे जाने लगे हैं। जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में हाल में हुए छा़ आंदोलन में जिस तरह से विभिन्न चैनलों के पत्रकारों को अपमानित किया गया और जिस तरह से मीडिया घरानों के नाम लेकर नारेबाजी हुई, वह इस बात का प्रमाण है कि मीडिया समाज में अपनी विश्वसनीयता और अपना सम्मान पूरी तरह से खो चुका है।

चुनाव के दौरान पेड न्यूज का खेल किस कदर बढ़ गया है, इसका अंदाजा पिछले वर्ष नवम्बर में बीबीसी में प्रकाशित एक लेख से लगाया जा सकता है। इस लेख के अनुसार बीते चार सालों में 17 राज्यों में हुए चुनाव में पेड न्यूज से संबंधित 1400 से ज्यादा शिकायतें सामने आई। पंजाब विधानसभा चुनाव के दौरान पेड न्यूज की 523, गुजरात चुनाव मंे 414, हिमाचल प्रदेश चुनाव में 104 और कर्नाटक चुनाव में 93 शिकायतें चुनाव आयोग की मिली। इन शिकायतों से स्पष्ट है कि पेड न्यूज के मामले लगातार बढ़ रहे हैं और दर्ज भी किये जा रहे हैं।
भारत में पेड न्यूज की स्थिति को लेकर भारतीय प्रेस काउंसिल की एक सब-कमेटी की ओर से परंजॉय गुहा ठाकुराता और के श्रीनिवास रेड्डी ने मिलकर एक विस्तृत रिपोर्ट तैयार की थी। लंबे समय तक उसे सार्वजनिक नहीं किया गया। फिर 2011 में तत्कालीन केंद्रीय सूचना आयुक्त के आदेश के बाद इस रिपोर्ट को जारी किया गया।

ठाकुरता अपनी उस रिपोर्ट के बारे में बताया था, ‘‘34 हजार शब्दों की रिपोर्ट थी, हमने जिन पर आरोप लगाया था उनसे भी बात की थी, उनके जवाबों को भी शामिल किया है। हमने अपनी रिपोर्ट में हर अखबार का नाम लिखा है, हर मामले की जानकारी दी ह। उनके प्रतिनिधियों के जवाब भी लिखे हैं. लेकिन प्रेस काउंसिल ने दस महीने तक उस रिपोर्ट को सार्वजनिक नहीं होने दिया। दरअसल ऐसा मीडिया घरानों के मालिकों के दबाव में किया गया था। ठाकुरता ये भी मानते हैं कि उन लोगों ने करीब आठ नौ साल पहले जो अध्ययन किया था, वह आज भी उसी रूप में मौजूं बना हुआ है क्योंकि पेड न्यूज के लिए मोटे तौर पर वही तौर तरीके अपनाए जा रहे हैं।

हालांकि समय के साथ पेड न्यूज के तौर तरीकों को ज्यादा परिष्कृत किया जा रहा है। इसका दायरा अखबारों में विज्ञापन और खबर छपवाने से आगे बढ़ रहा है। विपक्षी उम्मीदवारों और राजनीतिक दलों की छवि धूमिल की जा रही है। आज के दौर में पेड न्यूज का कोई स्वरूप तो निश्चित नहीं है, ये कैश भी हो सकता है और विज्ञापन अथवा उपहार के रूप में भी। खासकर सरकारी विज्ञापनों और अन्य सुविधाओं के नाम पर सरकारें इसके लिए जबरदस्त दबाव बनाती हैं। दरअसल आज के दौर में सरकारों की नजरें अपने खिलाफ छपने वाली एक-एक खबर पर होती है और सरकार के विरुद्ध लगातार खबरें देने वाले मीडिया घरानों के विज्ञापन बंद करने सहित उनके खिलाफ दूसरी तरह की कार्रवाई किये जाने की आशंका भी लगातार बनी रहती है।

पेड न्यूज का कॉन्सेप्ट कितना भयंकर रूप ले चुका है, इसका खुलासा हाल में कोबरा पोस्ट के एक स्टिंग में हो चुका है। इस स्टिंग के माध्यम से दावा किया गया था कि कुछ मीडिया संस्थान पैसों के ऐवज में कंटेंट के साथ फेरबदल करने तक के लिए तैयार नजर आए। खास बात यह है कि पेड न्यूज अब चुनाव तक ही सीमित नहीं रह गया है। अब तो सामान्य खबरों के साथ भी खुलकर ऐसा होने लगा है। दुनियाभर में मूल्य आधारित पत्रकारिता को बढ़ावा देने वाले एथिकल जर्नलिज्म नेटवर्क ने ‘अनटोल्ड स्टोरीज- हाउ करप्शन एंड कॉन्फिलिक्ट्स ऑफ इंटरेस्ट स्टॉक द न्यूजरूम’ शीर्षक वाले एक लेख में इस बात पर चिन्ता जाहिर की है कि अगर भारतीय मीडिया इंडस्ट्री के ताकतवर समूहों ने अभी ध्यान नहीं दिया तो भारतीय मीडिया में दिख रहा बूम पत्रकारिता और सच्चाई के लिए बेमानी साबित होगा।

अब पेड न्यूज के तौर-तरीकों में भी बदलाव आ रहा है। यह अब पहले से ज्यादा संगठित तरीके से होने लगा है। आज किसी भी संस्थान में पीआर एक आवश्यक विभाग बन गया है। पीआर का काम ही यही है कि मीडिया के संपर्क में रहे। अपने खिलाफ छपने वाली खबरों को रोके और अपने हित में खबरें छापने के लिए मीडिया संस्थानों को प्रेरित करे। कहना न होगा कि ऐसा करने के लिए मीडिया संस्थानों को किसी न किसी रूप में लाभ पहुंचाना होता है। तमाम संस्थानों में अब इस कार्य से अलग से बजट तक की व्यवस्था की जाने लगी है। मीडिया संस्थानों में पेड न्यूज बढ़ने की एक बड़ी वजह मार्केटिंग और एडिटोरियल विभागों का नजरिया एक-दूसरे जैसा हो जाना भी है। आज से तीन दशक पहले तक मार्केटिंग विभाग का नजरिया बेशक ज्यादा से ज्यादा बिजनेस समेटना होता था, लेकिन एडिटोरियल इससे पूरी तरह से अलग होता था। एडिटोरियल में कार्य करने वाले लोगों को मार्केटिंग से दूर-दूर तक कोई लेना-देना नहीं होता था, लेकिन अब ऐसा नहीं है, अब एडिटोरियल को बाकायदा निर्देश दिये जाते हैं कि कोई ऐसी खबर न छपे जिससे के अखबार के किसी विज्ञापनदाता के हित प्रभावित हों। एडिटोरियल में कार्य करने वाले ज्यादातर पत्रकार भी अब मार्केटिंग के लोगों की तरह ही सोचने-विचारने लगे हैं। अखबारों के न्यूज रूम में अब खबरों पर कम और विज्ञापनों अथवा मीडिया संस्थान द्वारा कराये जाने वाली बिजनेस संबंधी गतिविधियों पर ज्यादा चर्चा होती है।

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