घूमते-घूमते कहां पहुंच गये विजय भट्ट और इंद्रेश नौटियाल (दूसरा हिस्सा)

Vijay Bhatt/Indresh Nautiyal

 

गले दिन अपने दैनिक काम निपटा कर चाय नाश्ता खा पीकर हम तैयार हो गये। अपना पिठ्ठु तैयार कर लिया था क्योंकि हमें आज सुबह ही निजी काम से आगे जाना था। बहार बैठा ही था कि सामने से युवा कवि साथी संजीत समवेत आ गये। इनसे परिचय हुआ पहले ही परिचय में ये अपने हो गये। कुछ ही देर सत्र में उपस्थित होकर हमने आगे चलने के लिये इजाजत मांग ली और शानदार स्मृतियों को साथ में लेकर साथियों को अलविदा कह वहां से निकल आये। यह प्रवास नये पुराने साथियों से मेल मुलाकात के साथ मेरे लिये प्रेरणास्पद रहा।

 

झील पर दौड़ती मोटर बोट और उनमें सवार सैलानी आनंद लेते दिखाई दे रहे हैं। पर्वत राज हिमालय से उत्पन्न भागीरथी व भिलंगना के संगम पर दो जंगम नदियों के अविरल प्रवाह को बांध कर बनी यह झील राजशाही व टिहरी जनक्रांति के ऐतिहासिक गवाहियों के सबूतों को अपने में समेटे, सैलानियों का भरपूर मनोरंजन कर रही है। आगे सड़क के किनारे मरोड़ा गांव आ जाता है। यह वयोवृद्ध वामपंथी नेता कामरेड बचीराम कौंसवाल का गांव है। यहीं सड़क के किनारे उनके सुपुत्र मदन कौंसवाल ने ’’अपना गांव’’ नाम से होम स्टे बनाया हुआ है। वापसी में यहां रूकने की सोचकर हम आगे चल पड़े। सड़क से झाील के सुंदर दृश्य दिखाई दे रहे हैं। थोड़ा आगे चलकर डोबरा चांठी का पुल दिखाई देने लगा है। कुछ ही देर बाद हमारी बाइक डोबरा चांठी पुल पर प्रवेश कर गई। भारत के सबसे लंबे झूला पुल को बाइक से पार करते हुये रोमांच का अनुभव हो रहा था। पुल के उस पार चाय पकोड़े बेचने वालों के खोखे लगे हैं। यह चांठी है। हमने अपनी बाइक सड़क के किनारे लगा दी।
अब पैदल इस झूलापुल पर टहलने लगे। भागीरथी नदी में बनी झाील के उपर बना यह झूला पुल भारत का सबसे लंबा झूला पुल है। इसके एक तरफ डोबरा है और दूसरी ओर चांठी इसीलिये इसे डोबरा चांठी पुल कहा जाता है। जनता के लंबे संघर्षों के बाद सन् 2006 तत्कालीन मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी के शासन काल  में इस डोबरा चांठी पुल के निर्माण की स्वीकृति मिली थी। चैदह वर्षों के लंबे उतार चढ़ाव के बाद आठ नवंबर 2020 को इसे जनता के आवागमन के लिये खोला गया था। सात मीटर की चैड़ाई वाले इस पुल की लंबाई 725 मीटर है। इसके निर्माण में 295.92 करोड़ रूपये खर्च हुए है। चार पांच करोड़ की तो इसमें फसाट लाईट लगी है, जिसकी सतरंगी रोशनी में रात को दो घंटे के लिये यह पुल जगमगा उठता है। इसकी लाईट शाम केा सात से नो बजे तक जलती है और अभी शाम के पांच बजे हैं। इतनी दूर आकर इसकी जगमगाहट देखे बिना यहां से जाने का मन नही हुआ। बस चाय वाले के पास आकर बैठ गये ।

चाय पकोड़़ी खाते चाय वाले से गप्प लगाते हुये समय बिताने लगे। चाय वाला मोदी सरकार से खिन्न था कांग्रेस को जिताने की बात कर रहा था। सूर्य अस्तांचल को जा रहे थे। थोड़ी देर में सड़क की लाइट जल गयी। ठीक सात बजे इस झूलापुल पर धीरे धीरे करके फसाट लाइट अपना जादू बिखेरने लगी। नीला हरा लाल पीला बैंगनी आदि प्रकाश के परावर्तित रंगो से डोबराचांठी पुल बहुत ही खूबसूरत नजर आने लगा था। इसके दोनों किनारों पर बने 58 मीटर की उंचाई वाले दो दो टाॅवर रोशनी में जगमगा रहे थे। इस नजारे को देखने के लिये कई पर्यटक भी मौजूद थे। हमने झूला पुल के रंगीन दृश्यों को अपने केमरे में कैद किया और वापिस चल पड़े।
आठ बजे हम मरोड़ा ’’अपना गांव’’ होम स्टे पहुंच गये। यहां भाई मदन कौंसवाल ने हमारा गर्मजोशी के साथ स्वागत किया। हमारे खाने पीने का बेहतरीन इंतजाम किया। रात को संगीत की महफिल जमी। मदन भाई हारमोनियम की तान पर हमें बेहतरीन गजल और पुराने बिसरे सदाबहार गीत सुनाये जा रहे थे। इन्द्रेश ने भी गीत गाये। मैं तो दाद ही देता रहा। कब रात के ढाई बज गये पता ही न चला। अब तीन बजे के लगभग हम सो गये।
आज अक्तूबर महीने की 4 तारीख है और नींद देर से खुली। मनमोहन भाई खुद की बनाई हुई गरमागर्म चाय लेकर हाजिर हुए। चाय पीकर सुबह के जरूरी काम निपटाये। नीचे इनका सगवाड़ा मतलब किचन गार्डन है जिसमें मौसमी सब्जीयां लगी हुई हैं। हमें देने के लिये वहां से मनमोहन काफी सारे सफेद करेले तोड़ लाये। हम उनके गांव वाले घर देखने मरोड़ा चले आये। वहां कामरेड बचीरमाम कौंसवाल जी के घर पर उनके छोटे भाई से भेंट हुई । कामरेड कौंसवाल के पड़ोस में ही बहुगुणा बंधुओं का मकान है जहां 1927 में विश्वविख्यात पर्यावरणविद् श्री सुंदर लाल बहुगुणा जी ने जन्म लिया था। वहां अब कोई नही रह रहा है। इस गांव में डोभाल लोगों के भी परिवार है। मनमोहन बताते हैं कि अब यहां रेलवे लाइन आ रही है जिसका सर्वे हो चुका है, भविष्य में मरोड़ा रेलवे स्टेशन होगा। मैं सोच रहा हूॅं कि यहां भविष्य में रेल तो दोड़ेगी पर किसके लिये, शिक्षा स्वास्थ्य और रोजगार की तलाश में यहां के स्थानीय निवासी बड़ी संख्या में पलायन करने पर मजबूर हुए है। यहां के पहाडी गांव धीरे धीरे़ मानव विहीन हो रहे हैं, कुछ गांव तो तथाकथित विकास की भेंट चढ़ गये बचे खुचों में ताले जड़े है और मकान जर्र जर्र हो गये हैं बस कुछ गिने चुने ही बचे हैं जिन्हे रेल चाहिये या अस्पताल पता नही। कुछ देर में नाश्ता कर हमने भाई मनमोहन से विदा ली, उनके साथ बिताई गई शाम एक यादगार शाम बनकर रह गयी।

 

लेखकद्वय घुमक्कड़ और सोशल एक्टिविस्ट हैं 

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